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हाइलाइट्स

  • सिंधु सभ्यता में भी था खादी कपड़ा
  • मुगल शासकों ने भी किया खादी का इस्तेमाल
  • जानें खादी कपड़े से जुड़ी रोचक तथ्य

Khadi History In Hindi: ‘खादी’ शब्द महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन की एक तसवीर को जोड़ता है। यह बात तो हम सभी जानते हैं कि खादी लंबे समय तक देश के स्वतंत्रता संग्राम और राजनीति से जुड़ी रही है। खादी एक कपड़ा है जो हाथ से काता जाता है और हाथ से बुना जाता है, यह आमतौर पर सूती फाइबर से बुना जाता है। हालांकि खादी को रेशम और ऊन से भी बनाया जाता है, जिसे खादी रेशम या ऊनी खादी से भी जाना जाता है। खादी कपड़े को इसकी बनावट, आरामदायक एहसास और गर्मियों में लोगों को ठंडा रखने की क्षमता के लिए जाना जाता है।
आधुनिक दौर में भी भारतीयों के बीच खादी वस्त्रों का चलन कम नहीं हुआ है। खादी कपड़े का इतिहास न सिर्फ महात्मा गांधी से जुड़ा है, बल्कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी इसके प्रमाण मिलते हैं।

प्राचीन काल में भी था खादी कपड़ा
हाथ से कताई और बुनाई हजारों वर्षों से चली आ रही है, इसलिए खादी के निर्माण को प्राचीन माना गया है। अध्ययनों के अनुसार, लगभग 2800 ईसा पूर्व सिंधु सभ्यता में कपड़ों का विकास होने की अच्छी परंपरा थी। सूत की कताई के लिए टेराकोटा स्पिंडल व्होरल (terracotta spindle whorl), बुनाई के लिए हड्डी से बने उपकरण, कपड़ों के डिजाइन के साथ टेराकोटा मोती और बुने हुए कपड़े पहनने वाली मूर्तियां इन सभी बातों के सही होने का सबूत देती हैं। सबसे मशहूर और पुरानी मूर्ति मोहनजोदड़ो के राजा की मूर्ति है। इसे सिंध, गुजरात और राजस्थान में आज भी इस्तेमाल में आने वाले पैटर्न के साथ पहने हुए दिखाया गया है।
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मुगल शासकों ने भी किया खादी का इस्तेमाल
अलेक्जेंडर ने भारत पर आक्रमण के समय मुद्रित और चित्रित कपास की खोज की। व्यापार मार्ग की स्थापना के साथ एशिया और यूरोप के कई हिस्सों में कपास का नया परिचय हुआ। मुगल शासक भी खादी के इस्तेमाल से अछूते नहीं रहे थे, उन्होंने अपनी कारीगरी और कढ़ाई के साथ खादी का नया निर्माण किया। आज इस कढ़ाई के गिट्टी, जंगीरा पाश्‍नी, बखिया, खताओ जैसे कई रूप देखने को मिलते हैं।
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स्वदेशी आंदोलन और खादी का इतिहास
17वीं सदी के आखिर में, यूरोप में भारतीय सूती वस्त्रों का विस्तार बड़े पैमाने पर हो चुका था। अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लिए यहां के बुनकरों का कारोबार ही नष्ट कर दिया, ताकि वे यहां कब्जा कर सकें। 1915 में, गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने देखा कि यहां अंग्रेजों का कपड़ा उद्योग अपने चरम पर था। अंग्रेज यहां से कच्चा माल ले जाकर वहां तैयार करते थे और फिर उसी कपड़े को यहां बेचते थे। गांधी जी ने 1920 के शुरुआती दिनों में, ग्रामीण स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के लिए खादी को बढ़ावा देना शुरू कर दिया था। जल्द ही यह स्वदेशी आंदोलन का एक प्रतीक बन गया। उन्होंने अपनी किताब यंग इंडिया में लिखा है कि चरखा देश की समृद्धि और स्वतंत्रता का प्रतीक है। उन्होंने आह्वान पर आजादी के हर एक नायक चरखे का इस्तेमाल, खुद के कपड़े को बनाने के लिए करने लगे।

गांधी जी का मानना था कि “खादी के कपड़े पहनना न सिर्फ अपने देश के प्रति प्रेम और भक्ति-भाव दिखाना है बल्कि कुछ ऐसा पहनना भी है, जो भारतीयों की एकता दर्शाता है।”

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